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Showing posts from July, 2014
नया बॉस या नया बांस नया बॉस आया नया बॉस आया यह खबर किसी भी संस्थान चाहे वह सरकारी हो या निजी ..नया बॉस एक ऐसा शब्द है जो संशय खुशी रंज और आश्चर्य डर दहशत उत्साह सभी गुणों को एक साथ जाग्रत कर देता है। बॉस के सामने जाना उनसे मुलाकात करना उनकी बातों से प्रभावित होना और उन्हें प्रभावित करना अपने आपमें बहुत बड़ा गुण हैं। जिंदगी में ज्यादा प्रोफेशनलिज्म नहीं सीख पाए सो इन गुणों की गहराई तक पहुंच नहीं पाए खैर नया बॉस एक ऐसा प्राणी होता है जिसकी चर्चा फोर्थ क्लास कर्मचारी से लेकर जस्ट जूनियर सभी करते हैं। बॉस ऐसे है वैसे है बॉस नरम मिजाज है गरम मिजाज हैं। बॉस नाम का प्राणी ऐसा होता है कि वह सरकारी हो या निजी सभी संस्थानों में अपनी अपने व्यवहार के लिए जाना जाता है। आदिकालीन भारतीय सभ्यता का अगर अनुसरण करें तो वह बॉस ही क्या जो अपनी हेकड़ी ना दिखाएं वैसे यह भी सच है कि बॉस अगर हेकडी़ ना दिखाएं तो उन्हें हम बॉस ही नहीं मानते हैं। मेरा यह निजी अनुभव है कि अगर बॉसगीरी नहीं आई तो समझ लीजिए जूनियर अपनी जूनियरी दिखा ही देते हैं। 
 पीं पीं में गुम हो गया भोपाल  भोपाल मध्यभारत का एक सुंदर शहर और शालीन शहर कहने को तो देश के बीचों बीच स्थित हमारा भोपाल दिल्ली मुंबई की चकाचौंध और रफ्तार से कोसों दूर एक अलसाया सुस्ताया सा लगता है रफ्ता रफ्ता इस शहर की सड़कों पर ट्रैफिक और वाहनों की घालमपेल जिस कदर बढ़ रही है वह मानो शहर को दिल्ली बंबई से कम मानने को किसी स्तर पर राजी नहीं है। हर एक बाइक सवार टॉम क्रूज की औलाद बनकर सिर पर मौत ओढ़कर ऐसा निकलता है मानो आज वह जंग जीतकर ही वापिस लौटेगा। अगर दिल्ली से तुलना करें तो बमुश्किल 15 किलोमीटर के दायरे में सभी कार्यालय निवास समेटे हुए है शहर .. हालांकि शहर इससे कहीं ज्यादा बहुत ज्यादा बड़ा है  लेकिन जो रहवास है वह  पंद्रह किलोमीटर के दायरे में फैला है। अगर किसी भी आम भोपाली को इन रास्तों से होते हुए अपने कार्यालय जाना हो तो वह आधे घंटे में आराम से पहुंच सकता है लेकिन फिर वह भोपाल ही कैसा। रास्ते भर आपके दायें बाये सूं सा पीं पी की आवाज सुनी नहीं तो फिर भोपाल की सवारी कैसी। कई बार तो इतना इरिटेट करती है गाड़ियों की ये पीपी .. एक दो बार झुंझलाकर सामने ही रो...