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Showing posts from April, 2015

बस तड़का चाहिए... न्यूज नहीं

 फेसबुक ट्विटर लिंकडेन यूट्यूब स्काइप इंस्ट्राग्राम आदि आदि लगता है कुछ ऐसा जैसे टेढा है पर मेरा है.. खाए जाओ खाए जाओ ... और कुरकुरे हैं तो बस एक के बाद दूसरा खाए जाओ मतलब यह है कि अब खा क्या रहे हैं उसमे कैलोरी कितनी वसा कितना है और अन्य पोषणहार कितना है इससे मतलब नहीं हां बस यह है कि वो चटपटा है तीखा है पहला स्वाद अच्छा है सो लपलपाती जीभ वही स्वाद चाहती है.. बस कुछ यूं ही है सोशल मीडिया यूट्यूब पर एक घंटे पहले अपलोड हुआ वीडियो दस हजार बार देखा जाता है तो व्हाट्सएप पर एक समाचार का संदेश मिनटों में अमेरिका से भोपाल और भोपाल से डिंडौरी के किसी गांव में चला जाता है ...सहजता, सुंदरता और अच्छी पैकेंजिग कंटेट में भले ही दम ना हो लेकिन बस दर्शक एक बार दर्शन कर ले यही सोशल मीडिया का प्रमुख उद्देश्य है। अगर आपने खोला अच्छा लगा तो पूरा पढ़ो नहीं तो आगे बढ़ जाओ . कहां वो सुबह सुबह पेपर का इंतजार और कहां अब घटना के चंद सेकंडों में खबरों का लाखों मील का सफर ..  सूचना क्रांति ने खबरों की रफ्तार में तेजी लाई तो खबरों की धार में भी तेजी आ गई है। अब हेडिंग यह नहीं होगी कि अमेरिका पर साल 2...

सवाल टाइमिंग का है बॉस

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क्रिकेट में बल्लेबाज की टाइमिंग का बहुत महत्व होता है सचिन तेंदुलकर राहुल द्रविण या वीवीएस लक्ष्मण इसलिए सफल हुए क्योंकि गेंदबाजों की गेंदों का सामना करते हुए अपने बल्ले की टाइमिंग का खास खयाल रखते थे कब स्पिनर्स को मारना है तो कब तेज गेंदबाजों की गेंदों को सावधानी से खेलना है तो किसी बाउंसर होती गेंद को फाइन लेग पर उठाकर मारना है .. यह उनकी बेहतर टाइमिंग और कलात्मक बल्लेबाजी ही थी जो आज भी वे बेहतरीन बल्लेबाजी के लिए नजीर माने जाते हैं . फिल्मों में भी डॉयलॉग की टाइमिंग का अपना खास महत्व और मतलब माना जाता है। अभिताम बच्चन को बेहतरीन अभिनेता इसीलिए माना जाता है क्योंकि वे अपनी अभिव्यक्ति में काफी सक्षम थे उनके डॉयलॉग मौजू रहते हैं वे समय और परिस्थिति के मुताबिक डॉयलॉग बोलते हैं। वहीं फिल्म अभिनेता राजकुमार अपने डॉयलॉग और उनकी अंदाज के कारण ही चर्चित हैं। बात टाइमिंग की हो तो चाहे वह खेल हो या फिल्म हो या फिर राजनीति सभी जगह टाइमिंग का खेल है। सूचना संसाधनों के बेहतरीन उपयोग में माहिर केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की शिवराज सरकार भी अपनी राजनीति को चमकाने में टाइमिंग का बेहतरीन उपयोग ...

सावधान .. कोई आपको बोलने से रोक रहा है

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इस समय देश में सूचनाओं की आजादी का प्रश्न तेजी से फैला हुआ है। खासकर सूचना तकनीक के एक अहम स्रोत इंटरनेट की आजादी का। भारत में यह सवाल विकसित देशों की अन्य बातों की तरह ही प्रसारित हुआ है। एक विश्व की संकल्पना के जो दुष्प्रभाव हो सकते हैं वे बड़ी तेजी से प्रसारित होते हैं चाहे वह हथियारों का प्रसार हो या फिर सूचनाओं पर पाबंदी लगाने का। निजी कंपनियां चाहती हैं कि वे अब अपने उपभोक्ताओं को इंटरनेट प्रोवाइडर के रूप में काम ना करते हुए विनियामक की भूमिका में काम करें। मतलब यही कि उनकी इंटरनेट सेवाओं का किस रूप में और किन साइटों को देखने में उपयोग किया जा रहा है यह काम वे तय करें। जाहिर है इसका विरोध हो रहा है और ज्यों ज्यों लोग इस विषय पर जानकारी हासिल कर रहे हैं उनका विरोध संख्यात्मक रूप में और अभिव्यक्ति के रूप में अपने पांव पसार रहा है। नेट न्यूट्रिलिटी की मांग कर रहे भारतीयों ने इस संंबंध में ट्राई यानी टेलीकाम रेगुलेटरी अथारिटी ऑफ इंडिया को बाकायदा अपना विरोध दर्ज कराने के लिए ईमेल भी भेजे हैं। भारत सरकार का सूचना एवं प्रोद्योगिकी मंंत्रालय नेट न्यूट्रिलिटी के संबंध में मई के दूसरे सप...