बस तड़का चाहिए... न्यूज नहीं

 फेसबुक ट्विटर लिंकडेन यूट्यूब स्काइप इंस्ट्राग्राम आदि आदि लगता है कुछ ऐसा जैसे टेढा है पर मेरा है.. खाए जाओ खाए जाओ ... और कुरकुरे हैं तो बस एक के बाद दूसरा खाए जाओ मतलब यह है कि अब खा क्या रहे हैं उसमे कैलोरी कितनी वसा कितना है और अन्य पोषणहार कितना है इससे मतलब नहीं हां बस यह है कि वो चटपटा है तीखा है पहला स्वाद अच्छा है सो लपलपाती जीभ वही स्वाद चाहती है.. बस कुछ यूं ही है सोशल मीडिया यूट्यूब पर एक घंटे पहले अपलोड हुआ वीडियो दस हजार बार देखा जाता है तो व्हाट्सएप पर एक समाचार का संदेश मिनटों में अमेरिका से भोपाल और भोपाल से डिंडौरी के किसी गांव में चला जाता है ...सहजता, सुंदरता और अच्छी पैकेंजिग कंटेट में भले ही दम ना हो लेकिन बस दर्शक एक बार दर्शन कर ले यही सोशल मीडिया का प्रमुख उद्देश्य है। अगर आपने खोला अच्छा लगा तो पूरा पढ़ो नहीं तो आगे बढ़ जाओ . कहां वो सुबह सुबह पेपर का इंतजार और कहां अब घटना के चंद सेकंडों में खबरों का लाखों मील का सफर .. 
सूचना क्रांति ने खबरों की रफ्तार में तेजी लाई तो खबरों की धार में भी तेजी आ गई है। अब हेडिंग यह नहीं होगी कि अमेरिका पर साल 2001 में हमला करने वाला ओसामा बिन लादेन अमेरिकी कार्रवाई में मारा गया बल्कि .. हेडिंग होगी कि लादेन का खात्मा. अमेरिका ने लादेन को घर में घुसकर मारा.. गोया अमेरिका कोई पुलिस वाला हो या फिर अमेरिका कोई ठाकुर वंशी गांव का सरदार हो और लादेन एक ऐसा व्यक्ति जिसने उसका कर्ज लिया हो और फिर चुकाने से इंकार कर दे लिहाजा सोशल मीडिया अब खबरों को इस तरह से परोस रहा है कि आपके अंदर पहली नजर में खबर पढ़ने के लिए दिलचस्पी पैदा हो जाए फिर आप अंदर तक उसे दिलचस्पी से पढ़ते जाएं वहीं इंटरेस्टिंग बनाने के लिए खबरों के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए जाते हैं लिहाजा जिसकी जितनी इच्छा वह वीडियो देखकर खबरों को अंदर तक अनुभूत कर सकता है। 

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