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शक्ति की उपासना का नवरात्र ...मैं यह व्रत हर वर्ष रखता हूं हर वर्ष देवी की आराधना करता हूं। दोनों समय व्रत और खुद को साफ स्वच्छ रखने की पूरी कोशिश होती है। मां के दर्शन पवित्र धर्मग्रंथों का परायण इसके साथ ही साथ कोशिश करना कि हर वर्ष मां के दर्शन कर सकूं । क्या नवरात्र दोनों समय व्रत रखने और धर्मग्रंथों के परायण के दिन हैं क्या हमें यह सीख नहीं लेनी चाहिए कि आज के दौर में नवरात्रि का क्या महत्व है। क्या हमें नवरात्र का महत्व इस तरह नहीं सीखना चाहिए कि नवरात्रि दरअसल हमारे सकल ब्रह्मांड में स्त्री शक्ति के महत्व और उसके महत्व की ओर इंगित करता है। हममे से कितने लोग हैं जिन्होंने नारी की शक्ति के महत्व को पहचाना है औऱ उसके गौरव को वापिस दिलाने की ओर प्रयास किए हैं। दरअसल हम चमत्कार को ही पहचान सके हैं। शक्ति का वह स्वरूप जो हमारे घरों  में निवास करता है वह स्वरूप जो हमारे साथ खेलता हंसता बोलता है हमें प्यार करता है हमें बुरी आदतों से परहेज करने से लेकर हमारे दुख सुख में साथ होता है शक्ति के उस स्वरूप की तरफ हम बिलकुल ध्यान नहीं देते हैं। दरअसल नवरात्र हमें हमारे उसी कर्तव्य और दायित...
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वो सुबह हमारे लिए ड्यूटी का समय हुआ करता था। देश की राजधानी सोने की तैयारी कर रही होती थी तब हम जागने के लिए सोते थे। वाकई अल सुबह 4 बजे उठना और फिर उठकर इतना तैयार होना कि कम से कम दोपहर 3.30 बजे तक के लिए आप अपनी निजी जिंदगी से फारिग हो जाएं। लेकिन यकीन मानिए बहुत खूबसूरत अहसास होता था वह सुबह उठना और फिर तत्कालीन स्वामी रामदेव के योग पर दिए प्रवचनों के माध्यम से सुबह करीब 30 मिनट हाथ पैर चलाना और फिर एक गर्मागर्म पटियाला चाय का पैग बनाकर पीना जिसके साथ कुछ और मिल जाए तो अपने राम ..  हालाकि मम्मी ने इसकी भी नियमित व्यवस्था कर रखी थी। उस समय की तैयारी और पापा की बचपन की तैयारियां याद करता हूं तो कुछ खास अंतर नजर नहीं आता । पापा जब चुनाव की ड्युटी पर जाते तो सुबह आठ बजे घर में एक मेले का सा माहौल मिलता   दो दिन के लिए उनकी तैयारियों को देखता तो पापा बहुत व्यस्त लेकिन उत्साहित नजर आते। यह कशिश जेनेटिक है या फिर कर्तव्य बोध लेकिन अपन ने काम दिल से किया। दिमाग नहीं लगाया शायद यह गलत भी रहा। 
नया बॉस या नया बांस नया बॉस आया नया बॉस आया यह खबर किसी भी संस्थान चाहे वह सरकारी हो या निजी ..नया बॉस एक ऐसा शब्द है जो संशय खुशी रंज और आश्चर्य डर दहशत उत्साह सभी गुणों को एक साथ जाग्रत कर देता है। बॉस के सामने जाना उनसे मुलाकात करना उनकी बातों से प्रभावित होना और उन्हें प्रभावित करना अपने आपमें बहुत बड़ा गुण हैं। जिंदगी में ज्यादा प्रोफेशनलिज्म नहीं सीख पाए सो इन गुणों की गहराई तक पहुंच नहीं पाए खैर नया बॉस एक ऐसा प्राणी होता है जिसकी चर्चा फोर्थ क्लास कर्मचारी से लेकर जस्ट जूनियर सभी करते हैं। बॉस ऐसे है वैसे है बॉस नरम मिजाज है गरम मिजाज हैं। बॉस नाम का प्राणी ऐसा होता है कि वह सरकारी हो या निजी सभी संस्थानों में अपनी अपने व्यवहार के लिए जाना जाता है। आदिकालीन भारतीय सभ्यता का अगर अनुसरण करें तो वह बॉस ही क्या जो अपनी हेकड़ी ना दिखाएं वैसे यह भी सच है कि बॉस अगर हेकडी़ ना दिखाएं तो उन्हें हम बॉस ही नहीं मानते हैं। मेरा यह निजी अनुभव है कि अगर बॉसगीरी नहीं आई तो समझ लीजिए जूनियर अपनी जूनियरी दिखा ही देते हैं। 
 पीं पीं में गुम हो गया भोपाल  भोपाल मध्यभारत का एक सुंदर शहर और शालीन शहर कहने को तो देश के बीचों बीच स्थित हमारा भोपाल दिल्ली मुंबई की चकाचौंध और रफ्तार से कोसों दूर एक अलसाया सुस्ताया सा लगता है रफ्ता रफ्ता इस शहर की सड़कों पर ट्रैफिक और वाहनों की घालमपेल जिस कदर बढ़ रही है वह मानो शहर को दिल्ली बंबई से कम मानने को किसी स्तर पर राजी नहीं है। हर एक बाइक सवार टॉम क्रूज की औलाद बनकर सिर पर मौत ओढ़कर ऐसा निकलता है मानो आज वह जंग जीतकर ही वापिस लौटेगा। अगर दिल्ली से तुलना करें तो बमुश्किल 15 किलोमीटर के दायरे में सभी कार्यालय निवास समेटे हुए है शहर .. हालांकि शहर इससे कहीं ज्यादा बहुत ज्यादा बड़ा है  लेकिन जो रहवास है वह  पंद्रह किलोमीटर के दायरे में फैला है। अगर किसी भी आम भोपाली को इन रास्तों से होते हुए अपने कार्यालय जाना हो तो वह आधे घंटे में आराम से पहुंच सकता है लेकिन फिर वह भोपाल ही कैसा। रास्ते भर आपके दायें बाये सूं सा पीं पी की आवाज सुनी नहीं तो फिर भोपाल की सवारी कैसी। कई बार तो इतना इरिटेट करती है गाड़ियों की ये पीपी .. एक दो बार झुंझलाकर सामने ही रो...