वो सुबह हमारे लिए ड्यूटी का समय हुआ करता था। देश की राजधानी सोने की तैयारी कर रही होती थी तब हम जागने के लिए सोते थे। वाकई अल सुबह 4 बजे उठना और फिर उठकर इतना तैयार होना कि कम से कम दोपहर 3.30 बजे तक के लिए आप अपनी निजी जिंदगी से फारिग हो जाएं। लेकिन यकीन मानिए बहुत खूबसूरत अहसास होता था वह सुबह उठना और फिर तत्कालीन स्वामी रामदेव के योग पर दिए प्रवचनों के माध्यम से सुबह करीब 30 मिनट हाथ पैर चलाना और फिर एक गर्मागर्म पटियाला चाय का पैग बनाकर पीना जिसके साथ कुछ और मिल जाए तो अपने राम .. 
हालाकि मम्मी ने इसकी भी नियमित व्यवस्था कर रखी थी। उस समय की तैयारी और पापा की बचपन की तैयारियां याद करता हूं तो कुछ खास अंतर नजर नहीं आता । पापा जब चुनाव की ड्युटी पर जाते तो सुबह आठ बजे घर में एक मेले का सा माहौल मिलता   दो दिन के लिए उनकी तैयारियों को देखता तो पापा बहुत व्यस्त लेकिन उत्साहित नजर आते। यह कशिश जेनेटिक है या फिर कर्तव्य बोध लेकिन अपन ने काम दिल से किया। दिमाग नहीं लगाया शायद यह गलत भी रहा। 

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