हारिए न हिम्मत बिसारिये न राम।
ऐसा कौन व्यक्ति होगा जिसने जीवन में मुसीबत न झेली हो जिसके जीवन काल में उसके उपर विपत्ति न आई हो। विपत्ति के समय मन अधीर हो जाता है स्वाभाविक है जब अपनी मर्जी अपनी इच्छा के मुताबिक घटनाएं घटित नहीं होती हैं तो अधीर होना स्वाभाविक वृति है। मनुष्य अपने को निरीह और बेचारा समझ लेता है। यही वह वक्त होता है जब आदमी के धैर्य की परीक्षा होती है। उस मनुष्य के अंदर का आत्म बल परमात्मा में भरोसे की क्षमता और कठिनाइयों से निपटने के लिए आवश्यक बुद्दि का वास्तविक परीक्षण होता है। जो विपत्ति में धैर्य धारण कर विपत्ति का सामना करता है वह पहले की अपेक्षा और मजबूत होकर समाज में स्थापित होता है और जो टूट जाता है वह जीवन भऱ में नहीं संभल पाता है। इसलिए बड़ी से बड़ी कठिनाई में भी मनुष्य को दो कार्य अवश्य करना चाहिए। साहस और भगवान का आश्रय जिसने इन दोनों का सहारा नहीं छोड़ा वह प्रत्येक विपत्ति के बाद और मजबूत होता गया है। इसीलिए कहा जाता है हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम... विजय के मनोविज्ञान को प्रयोग करना सीखें। कुछ लोग सुझाते हैं कि हार की बात कभी नहीं करना चाहिए। सबसे पहले अपनी हार और उसके कारणों ...