घर का रिनोवेशन
घर को नए सिरे से बनाने की जद्दोजहद जारी है। पैसा इफरात दे दिया है जितना दिया जाना है अब तक उससे कहीं ज्यादा दिया है। लेकिन मुई जबान और लोगों के ईमान का कोई भरोसा नहीं लिहाजा कहीं ज्यादा निकल गया है। अपनी गाढी कमाई और पाई पाई का हिसाब रखने के बाद भी पैसा बचता नहीं है। खैर.... खबर यह है कि घर का रिनोवेशेन का काम जारी है। पुराने सब बदल डालूंगा की तर्ज पर सोचा था एक शानदार मकान बनेगा मार्बल की ठंडी जमीन के स्थान पर टाइल्स बिछेंगे ... बिछे भी... माडुलर किचन होगा ... हो भी रहा है। घर की खिड़कियां पुराने जमाने की हैं जिसमें लकड़ी के पल्ले लगे हुए हैं इनके स्थान पर अब साफ हवादार एल्युमिनियम के पल्ले लगेंगे जो एक सटाक में खुल और बंद हो जाएंगे फिलहाल पता नहीं लेकिन उम्मीद से हैं कि शायद बदलेंगे।
तो घर तो बन ही रहा है रिनोवेट भी हो रहा है नए काम चल रहे हैं लेकिन क्या वाकई "घर" बन रहा है महज एक साल पहले तक घर गुलजार था किचकिच से अशांति से आपसी वैमनस्यता और सिर फुटव्वल के बीच मजबूरी ही सही एक साझी एकरसता से। सब्जियां आती थीं तो बनती थीं। घर में आटा आता था तो रोटियां बनती थीं। किचन में काम होता था तो लगता था कि रसोई चल रही है। कह सकते हैं एक किस्म की जीवंतता रही है पापा अपनी बीमारी से जूझते हुए हम सभी दिलासा देते हुए मां अपने जीवन साथी की तकलीफ को समझते हुए मन में दर्द लिये सभी को दिलासा देते हुए और घर की एक रसता को बनाए रखने की असफल सी कोशिश करते हुए। हां वह घर था। वह घर ही क्या जिसमें चार बासन हो और न खड़कें ऐसा घर भी क्या जिसमें केवल अचाह को हासिल करने की अधूरी चाहत ही भरी हो। सुबह शाम अनुलोम विलोम योग प्राणायाम और चाय के दौर एलोपेथी और आयुर्वेदिक पर चिंतन मनन और बहस . चलती रहती थी। वह घर जिसमें सभी के लिए जगह रहती थी। वह घर जिसमें कोई भी आने और ठहरने को हक समझता रहा है शायद वह घर अब रिनोवेट हो गया है।
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