पीं पीं में गुम हो गया भोपाल
भोपाल मध्यभारत का एक सुंदर शहर और शालीन शहर कहने को तो देश के बीचों बीच
स्थित हमारा भोपाल दिल्ली मुंबई की चकाचौंध और रफ्तार से कोसों दूर एक अलसाया
सुस्ताया सा लगता है रफ्ता रफ्ता इस शहर की सड़कों पर ट्रैफिक और वाहनों की
घालमपेल जिस कदर बढ़ रही है वह मानो शहर को दिल्ली बंबई से कम मानने को किसी स्तर
पर राजी नहीं है। हर एक बाइक सवार टॉम क्रूज की औलाद बनकर सिर पर मौत ओढ़कर ऐसा
निकलता है मानो आज वह जंग जीतकर ही वापिस लौटेगा। अगर दिल्ली से तुलना करें तो
बमुश्किल 15 किलोमीटर के दायरे में सभी कार्यालय निवास समेटे हुए है शहर ..
हालांकि शहर इससे कहीं ज्यादा बहुत ज्यादा बड़ा है लेकिन जो रहवास है वह पंद्रह किलोमीटर के दायरे में फैला है। अगर किसी
भी
आम भोपाली को इन रास्तों से होते हुए अपने कार्यालय जाना हो तो वह आधे घंटे
में आराम से पहुंच सकता है लेकिन फिर वह भोपाल ही कैसा। रास्ते भर आपके दायें बाये
सूं सा पीं पी की आवाज सुनी नहीं तो फिर भोपाल की सवारी कैसी। कई बार तो इतना
इरिटेट करती है गाड़ियों की ये पीपी .. एक दो बार झुंझलाकर सामने ही रोक दी और
गाड़ी बंद करके जबरदस्ती खड़ी कर दी। मतलब आ बैल मुझे मार लेकिन अपन भी कहां मानने
वाले हैं एक दो बार हार्न बजाने वालों के करीब जाकर कहा कि भैया क्या दिक्कत है
पूरी सड़क खाली है क्यों जबरदस्ती गाड़ी का कान उमेठो हो तो भिया जी बस मुस्करा के
रह गए .. लेकिन जो मान जाए वो भारतीय कैसा ... पचास हजार की गाड़ी खरीदी है तो
उसका दंश तो आपको भुगतना ही पड़ेगा .... सो भुगत रहे हैं।
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