सावधान .. कोई आपको बोलने से रोक रहा है
इस समय देश में सूचनाओं की आजादी का प्रश्न तेजी से फैला हुआ है। खासकर सूचना तकनीक के एक अहम स्रोत इंटरनेट की आजादी का। भारत में यह सवाल विकसित देशों की अन्य बातों की तरह ही प्रसारित हुआ है। एक विश्व की संकल्पना के जो दुष्प्रभाव हो सकते हैं वे बड़ी तेजी से प्रसारित होते हैं चाहे वह हथियारों का प्रसार हो या फिर सूचनाओं पर पाबंदी लगाने का। निजी कंपनियां चाहती हैं कि वे अब अपने उपभोक्ताओं को इंटरनेट प्रोवाइडर के रूप में काम ना करते हुए विनियामक की भूमिका में काम करें। मतलब यही कि उनकी इंटरनेट सेवाओं का किस रूप में और किन साइटों को देखने में उपयोग किया जा रहा है यह काम वे तय करें। जाहिर है इसका विरोध हो रहा है और ज्यों ज्यों लोग इस विषय पर जानकारी हासिल कर रहे हैं उनका विरोध संख्यात्मक रूप में और अभिव्यक्ति के रूप में अपने पांव पसार रहा है। नेट न्यूट्रिलिटी की मांग कर रहे भारतीयों ने इस संंबंध में ट्राई यानी टेलीकाम रेगुलेटरी अथारिटी ऑफ इंडिया को बाकायदा अपना विरोध दर्ज कराने के लिए ईमेल भी भेजे हैं। भारत सरकार का सूचना एवं प्रोद्योगिकी मंंत्रालय नेट न्यूट्रिलिटी के संबंध में मई के दूसरे सप्ताह में कोई निर्णय करेगा। यहां हमें जानना आवश्यक है कि नेट न्यूट्रिलिटी का तात्पर्य सरल भाषा में क्या है। हमारे घरों में डिस्क के माध्यम से निजी चैनलों का प्रवाह तो सभी के घरों में होता है। क्या आपको याद है कि आज से पांच सात साल पहले तक आपकी डिस्क फ्री थी मतलब अपनी कालोनी या शहर या गांव में डिस्क चलाने वाले को आप महीने के सौ दो सौ रूपये देते थे और उसके एवज में वो जितने चैनल चलाता था वो सभी आपके टीवी पर आ पाते थे। लेकिन जब से दूरसंचार की बड़ी कंपनियां इस बिजनेस में उतरी हैं और इस उद्योग ने एक संगठित स्वरूप लिया है तबसे मनोरंजन का खर्च तेजी से बढ़ गया है। टाटा स्काई एयरटेल वीडियोकान डिश टीवी सहित अन्य कंपनियां अब चैनल दिखाने के एवज में उपभोक्ताओं से पैसा वसूल कर रही है. अगर किसी को स्टार स्पोर्ट्स देखना है तो वह केवल स्टार स्पोर्टस देखे बाकी कोई चैनल वो नहीं देख सकता है इसी तरह अगर कोई उपभोक्ता न्यूज चैनल देखना चाहता है तो वह केवल न्यूज चैनल का पैक खरीदे ... मतलब अगर आप न्यूज चैनल देखते देखते स्टार स्पोर्ट्स देखना चाहें तो अतिरिक्त शुल्क देना होगा और अगर सभी चैनल देखना चाहते हैं तो पहले जहां सौ दो सो रूपए में बात बन जाती थी अब उसके एवज में पांच सात सौ रुपए का खर्च करना होगा। कंपनियों का तर्क है कि उन्हें चेनल दिखाने के लिए अपने संसाधनों का इस्तेमाल करना होता है बाकायदा अपने कर्मचारियों को वेतन देना होता है वगैरह वगैरह लेकिन कौन नहीं जानता कि इन कंपनियों ने खुद को बड़े स्तर पर तो संगठित बना रखा है लेकिन जब बात स्थानीय शहरी स्तर पर आती है तो पता चलता है कि केबल ऑपरेटर चैनल दिखाने के लिए चैनलों से करोड़ों रुपयों की बसूली करती हैं। सूचना प्रोद्योगिकी के इस बेजा उपयोग या कि कहें कि उपभोक्ताओं को लूटने की कवायद अब इंटरनेट पर भी लागू होने की आशंका है। इंटरनेट प्रोवाइडर कंपनियां चाहती हैं कि वे तय करें कि उपभोक्ता कौन सी वेबसाइट सोशलसाइट्स और मैसेंजर सेवा का उपयोग करें। मसलन अगर आप व्हाट्सएप फेसबुक जीमेल हाइक सहित अन्य सोशल साइट्स उपयोग कर रहे हैं तो आपको नेट पेक अलग रेट पर मिलेगा वहीं अगर आप चाहते हैं कि आप विकीपीडिया भारत सरकार की अन्य साइट्स अन्य दूसरी साइट्स खोलते हैं तो उसके लिए आपको अलग से पैक डलवाना होगा या अलग से कनेक्शन के लिए एक्सट्रा शुल्क देना होगा .. भारतीय इंटरनेट उपभोक्ता इसी का विरोध कर रहे हैं विरोधियों का तर्क है कि हम क्या देखना चाहते हैं यह हम तय करेंगे ना कि निजी कंपनियां । वहीं कंपनियों का तर्क है कि मौजूदा उपभोक्तावादी दौर में उनका मुनाफा कम हो गया है जबकि जिन कंपनियों को उनके माध्यम से चलाया जा रहा है वे तेजी से पैसा बना रही हैं। समस्या केवल पैसे की है। उपभोक्ता नेट न्यूट्रिलिटी का समर्थन कर रहे हैं अर्थात इंटरनेट की समानता हो वहीं निजी कंपनियां बाजार के हिसाब से चलने के लिए उपभोक्ताओं को बाध्य करना चाहती है। यहां पर सवाल केवल इंटरनेट की स्वतंत्रता का ही नहीं बल्कि उपभोक्ताओं की स्वतंत्रता का भी है। अगर पैसा ही हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा तो फिर गरीब व्यक्ति तो अपनी आवाज कभी बुलंद ही नहीं कर पाएगा। ना इस देश की सरकार को गरीब की आवाज सुनने को मिल सकेगी क्योंकि आज हम जिस दौर में रह रहे हैं वह दौर निश्चित ही गरीबों का तो कतई नहीं है। निजी कंपनियां अपने मुनाफे की आड़ में ऐसे अघोषित और अप्रकाशित कानून लागू करना चाहती हैं जिनपर कोई संविधान आईपीसी सीआरपीसी की कोई धारा नहीं लागू होगी जिन पर सरकार की कोई लगाम नहीं होगी । जाहिर है इसमें सरकार को भी सोचना होगा कि क्या भारतीय संविधान की धारा 19 में उल्लेखित जिस अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता का जिक्र किया गया है और मौजूदा दौर में जिसका बहुत कुछ मतलब इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति है क्या उसका हनन तो नहीं किया जा रहा है। क्या जिस लोककल्याणकारी और आम व्यक्ति के हितों की रक्षा करने का संकल्प लेकर सत्ता संभाली गई है वह उद्देश्य पूरा हो सकेगा। जाहिर है नेट पर पाबंदी का विरोध केवल इसका उपयोग करनेवाले उपभोक्ताओं के लिए ही नहीं बल्कि सरकार के लिए भी एक अहम प्रश्न होगा।


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