एक घोटाला जिसनें कईयों को मुर्दा बना दिया

वह मामला जिसमें राज्य सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री जेल तक जा चुके हों वह मामला जो देश के नंबर वन चैनल के पत्रकार की जान ले चुका हो वह मामला जिससे जुड़े कम्प्यूटर की खरीदी से संबंधित दस्तावेज न मिल सकें वह मामला जिसमें राज्य के मुखिया का दामन दागदार होने के पूरे अंदेशे हों ऐसे व्यापमं घोटाले में किसी प्रकार के षणयंत्र की बू न महसूस करते हुए सीबीआई यानी सरकारी तोते ने वही किया जो उसके आका ने कहा। सीबीआई ने इस पूरे मामले में सरकार के मुखिया को पूरी तरह से बचाते हुए आरोपों की तह तक जाने की बजाय मामले में सीधे जुड़े लोगों तक अपनी जांच को मोड़ दिया है। कह सकते हैं कि अब जांच अपने अहम मोड़ पर हैं व्यापमं के वो अधिकारी जो तत्कालीन समय में इस पूरी व्यवस्था के खैरख्वाह थे वो छात्र जो इस परीक्षा में ऐन केन प्रकारेण सफल हो सके थे वो निजी कॉलेज संचालक जो इस व्यवस्था को गंदी बनाने के लिए जिम्मेदार माने जा रहे थे जिन्होंने अपने कॉलेजों में ऊंची फीस और डोनेशन लेकर मेडिकल के इच्छुक बच्चों को चोर दरवाजों से रास्ता बनाया था उन सभी के खिलाफ आरोप पत्र दायर हो गए हैं। ताज्जुब है सीबीआई को इस पूरे मामले में सरकार के सभी साथी मिले लेकिन सरकार न मिले।

 व्यापम के लिए वर्ष 2012 से 2013 के बीच खरीदे गए 17.56 लाख रुपये कीमत के कंप्यूटरों की खरीद का सरकर के पास कोई रिकार्ड नहीं है। एक आरटीआई आवेदन पर मिली जानकारी के मुताबिक परीक्षा बोर्ड कंप्यूटरों की खरीद की मूल फाइलें, उनकी खरीद की वजह या उनकी खरीद के रजिस्टर ऑडिटर के सामने पेश नहीं कर सका। जबकि इन रिकार्ड का होना बहुत जरूरी है क्योंकि कंप्यूटर से उत्पन्न डिजिटल रिकार्ड और एक्सेल शीट आपराधिक मामलों के महत्वपूर्ण प्रमाण होते हैं. यह घोटाला बोर्ड द्वारा आयोजित प्रवेश परीक्षाओं में हेराफेरी से संबंधित है और कहा जाता है कि इसमें राज्य के नेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों और व्यवसायी तक शामिल हैं. 


राज्य के शिक्षा मंत्री एक साल जेल में रहे, वह जमानत पर छूटे हैं. ऑडिट रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि बोर्ड ने 2012 में फीस के रूप में एकत्र 6.95 लाख रुपये वापस क्यों किए जो राज्य सरकार की अनुमति के बगैर हवलदार की भर्ती परीक्षा में उपस्थित हुए अभ्यर्थियों से लिए गए थे. व्यापम स्थानीय निधि लेखा परीक्षा विभाग को किसी भी रिकार्ड या स्पष्टीकरण देने में विफल रहा है, क्योंकि यह राशि परिवहन विभाग को लौटा दी गई थी.

 व्यापम पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से पूछा, 2008 से 2012 तक के बीच मामलों की जांच क्यों नहीं की?  दुबे को अप्रैल, 2017 में स्थानीय निधि लेखा परीक्षा से रिपोर्ट मिली थी जो राज्य सरकार के वित्त विभाग के अंतर्गत आती है. उस रिपोर्ट के अनुसार, इस परीक्षा की फीस ओबीसी और अनारक्षित श्रेणियों के उम्मीदवारों के लिए 500 रुपये और अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) उम्मीदवारों के लिए 250 रुपये थी। इस दौरान 471 ओबीसी, अनारक्षित श्रेणी के 689 उम्मीदवार, एससी के 314 उम्मीदवार और एसटी के 148 अभ्यर्थियों से फीस प्राप्त हुई.  आडिट रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि व्यापम का परीक्षा अनुभाग यह बताने में भी विफल रहा है कि 2012-13 में कितनी परीक्षाओं का आयोजन किया गया, इस दौरान प्रत्येक परीक्षा में एसटी, एससी, ओबीसी और अन्य कितने आवेदक शामिल हुए, प्रत्येक परीक्षा का प्रवेश शुल्क और 2012-13 में परीक्षा से उत्पन्न कुल आय कितनी हुई. 


मध्यप्रदेश सालों से व्यापम घोटाले में फंसा हुआ था, लेकिन यह मामला तब प्रकाश में आया जब 2013 में 2009 की मेडिकल प्रवेश परीक्षा में किसी और के नाम पर परीक्षा देने वालों का पदार्फाश हुआ. इस सिलसिले में 20 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी, जिसके बाद से मामले से जुड़े करीब 45 लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है. मौतों को संज्ञान में लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने व्यापम ही नहीं, इस मामले से जुड़ी मौतों की सीबीआई जांच के आदेश दिए. हाल ही में 26 जुलाई को व्यापम घोटाले के अभियुक्त प्रवीण यादव ने कथित तौर पर मध्यप्रदेश के मुरैना स्थित अपने घर में आत्महत्या कर ली थी, जबकि उसकी अगले दिन जबलपुर उच्च न्यायालय में पेशी थी। 

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